तृणमूल कांग्रेस को SIR का भय
पश्चिम बंगाल में आजकल भय कई स्तरों पर महसूस किया जा रहा है। सत्ताधारी पार्टी और उनकी नेतृत्व टीम इस डर का इस्तेमाल राजनीतिक रणनीति के रूप में करती दिखती है, जबकि दूसरी ओर कुछ लोगों के मन में यह डर गहराई तक बैठाया जा रहा है।
हाल ही में, जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कोलकाता में I-PAC के कार्यालय पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की छापेमारी को राज्य पुलिस के जरिए रोकने का कदम उठाया, तो यह उनके राजनीतिक भय का एक महत्वपूर्ण प्रदर्शन था। तृणमूल कांग्रेस के पुराने आरोप—बंगाली बनाम बाहरी व्यक्ति और केंद्र द्वारा बंगालियों के खिलाफ कथित अन्याय की बातें—फिर सामने आईं। हालांकि ममता बनर्जी ने इसे मुख्यमंत्री के तौर पर उठाया गया कदम नहीं, बल्कि TMC की नेता के रूप में उठाए गए कार्यवाही बताया, लेकिन जिस प्रकार से राज्य मशीनरी ने उनका सहयोग किया, वह इस दावे पर सवाल खड़े करता है।
इस बीच, चुनाव आयोग पर हमला करना और विशेष संशोधित पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) के जरिए मतदाता सूची की सफाई की प्रक्रिया को रोकने का प्रयास उनके इस अदृश्य भय को दर्शाता है। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी ED के खिलाफ दर्ज की गई प्राथमिकी के संदर्भ में 'दखल और रुकावट' के मामले को गंभीर चिंता का विषय बताया। अब यह न्यायिक जांच पर छोड़ देना होगा कि ममता बनर्जी का यह डर कितना वास्तविक है।
हालांकि, 2021 विधानसभा चुनावों के बाद से, आम जनता के बीच एक अलग ही प्रकार का भय देखा गया है। TMC ने अपनी मजबूत राजनीतिक मशीनरी के जरिए जनता, खासकर मतदाताओं, में इस हद तक खौफ पैदा कर दिया है कि वे SIR का खुलेआम समर्थन करने से भी कतराते हैं। उन परिवारों (विशेषकर महिलाओं) को निशाना बनाए जाने की कहानियां आज भी ताजा हैं, जिन्होंने सत्तारूढ़ व्यवस्था का समर्थन नहीं किया। राज्य में कानून व्यवस्था की बिगड़ी स्थिति और प्रशासनिक तंत्र में फैले भ्रष्टाचार को लेकर गुस्सा लोगों में जारी है। राज्य भर में कानाफूसी करते हुए लोग वोटों में हेरफेर, गैर-कानूनी आप्रवासियों और राज्य मशीनरी द्वारा उनके समर्थन जैसी बातों पर चर्चा करते हैं। SIR की मांग इसलिए भी जोर पकड़ रही है ताकि इन सभी मुद्दों को सुलझाया जा सके और लोकतंत्र को बचाने का प्रयास आगे बढ़ सके।
बांग्लादेश की तर्ज पर बढ़ते खतरों ने हिंदू समुदाय में असुरक्षा की भावना को और गहराया है। पैनिक इतना अधिक बढ़ चुका है कि लोग खुलकर अपनी बात कहने से डर रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव उन्हें अपने डर को मात देने और अपनी आवाज उठाने का मौका देंगे? यह न सिर्फ पश्चिम बंगाल बल्कि पूरे देश के लिए चिंता का विषय बन गया है।
लोकतंत्र तभी सफल हो सकता है जब भयमुक्त वातावरण में निष्पक्ष चुनाव कराए जाएं। गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर के शब्दों को याद करें तो, "यदि दुर्बलता को पोषित किया जाए और उसे सहेज रखा जाए, तो दुर्भाग्य स्वयं आकर दस्तक देता है—इसे रोका नहीं जा सकता।" यह दुर्बलता डर और आपसी विभाजन से उपजती है।
पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र बचाने का एक ही उपाय प्रतीत होता है—समान अधिकारों और अन्याय के खिलाफ एकजुट प्रतिरोध। यह लड़ाई सिर्फ राजनीतिक विचारधारा से प्रेरित नहीं हो सकती; बल्कि यह सभ्यता की रक्षा और आने वाली पीढ़ियों के लिए विश्वास स्थापित करने की लड़ाई है। इसे जीतने के लिए साहस, एकता और दृढ़ संकल्प सबसे जरूरी हैं।
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