अमेरिकी तानाशाही का एक और उदाहरण
दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने खुद को आधुनिक और लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत किया, लेकिन उसके इतिहास का गहन विश्लेषण करें तो तस्वीर कुछ और ही नजर आती है। तथाकथित लोकतांत्रिक अमेरिका ने अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए लगातार गरीब और कमजोर देशों को निशाना बनाया। पिछले पांच दशकों में, अमेरिका ने कांगो, लेबनान, लीबिया, ईरान, इराक, सोमालिया, सूडान, अफगानिस्तान और सीरिया जैसे देशों पर अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन किया, जो पहले से ही आंतरिक संघर्ष और आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहे थे।
इराक पर 2003 में कथित बड़े पैमाने पर विनाशकारी हथियार रखने के आरोप लगाकर अमेरिका और NATO सेनाओं ने हमला किया, जिससे देश तहस-नहस हो गया। इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को एक विवादित अदालत के जरिए गिरफ्तार कर फांसी दे दी गई। इस संघर्ष में 5 लाख से ज्यादा नागरिकों की जान गई, और देश अभी तक इस विनाशकारी स्थिति से बाहर नहीं निकल पाया है। इसी तरह अफगानिस्तान भी अमेरिकी हस्तक्षेप के कारण बर्बादी की राह पर चला गया।
जो देश अमेरिकी दबाव स्वीकार नहीं करता, उसका हश्र मुश्किलों में पड़ना निश्चित है। वेनेज़ुएला इसका नया उदाहरण बना, जहां डोनाल्ड ट्रंप ने एक सैन्य अभियान चलाकर राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को गिरफ्तार किया। इस आक्रमण को गैंगस्टर पकड़ने का नाम दिया गया, लेकिन असल में यह एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र के शीर्ष नेता का अपहरण था। एक स्वतंत्र देश पर इस तरह हमला करना आधुनिक दुनिया के लोकतांत्रिक मूल्यों का स्पष्ट उल्लंघन है।
हमले के बाद ट्रंप ने व्हाइट हाउस में एक बयान देते हुए यह दावा किया कि अमेरिका जो कर सकता है, वह कोई और राष्ट्र नहीं कर सकता। उन्होंने गर्व से कहा कि वेनेज़ुएला अब अमेरिका के नियंत्रण में है, राष्ट्रपति मादुरो को गिरफ्तार कर लिया गया है और US कोर्ट में उनके खिलाफ मामला चलाया जाएगा। इसके साथ ही ट्रंप ने यह भी घोषणा की कि वेनेजुएला का तेल अब अमेरिकी कंपनियों के नियंत्रण में होगा। उन्होंने कहा कि जब तक उनकी नजर में सही सरकार नहीं आएगी, तब तक अमेरिका वेनेजुएला को नियंत्रित करेगा। इन सब बातों से स्पष्ट होता है कि अमेरिका का असली मकसद वेनेजुएला के तेल भंडार पर कब्जा करना है।
वेनेजुएला पर नजर डालें तो 1998 में ह्यूगो शावेज वहां के राष्ट्रपति बने। शावेज ने अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश को "शैतान" कहा था और उन पर तेल भंडार हड़पने की साजिश रचने का आरोप लगाया था। अपने शासनकाल में शावेज ने कई निजी तेल कंपनियों को बंद कर दिया और कुछ का राष्ट्रीयकरण करके अमेरिकी कंपनियों एक्सॉनमोबिल और कैनोकोफिलिप्स को बाहर का रास्ता दिखा दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि अमेरिका लंबे समय तक नाराज रहा। 2013 में निकोलस मादुरो सत्ता में आए और उन्होंने शावेज की अमेरिकी-विरोधी नीतियों को जारी रखा। हालांकि वे शावेज की तरह लोकप्रिय नेता साबित नहीं हुए।
मादुरो के शासनकाल में वेनेज़ुएला को गंभीर आर्थिक संकटों से गुजरना पड़ा। उनके नेतृत्व शैली पर भी तानाशाही का आरोप लगा क्योंकि उन्होंने प्रशासन में कई सैन्य अधिकारियों को शामिल कर दिया। 2024 के चुनावों में मादुरो को जीतने वाला घोषित किया गया था, लेकिन चुनाव परिणाम को कभी सार्वजनिक नहीं किया गया। विपक्षी नेता एडमंडो उरुतिया स्पष्ट रूप से विजेता लग रहे थे।
इस पूरे परिदृश्य पर नजर डालते हुए यह स्पष्ट होता है कि अमेरिका की रणनीति उसके वैश्विक प्रभाव और प्रभुत्व को बढ़ाने की कोशिशों का हिस्सा है। उसने गरीब और कमजोर देशों को निशाना बनाकर उनके प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने और उनकी स्वतंत्रता को सीमित करने का प्रयास किया है। सत्ता का यह घमंड अंतरराष्ट्रीय राजनीति में असंतुलन पैदा करता है।
डोनाल्ड ट्रंप के व्हाइट हाउस लौटते ही उन्होंने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। अमेरिका ने दिसंबर में एक अभियान शुरू किया, जिसमें मादुरो पर आरोप लगाया गया कि वह वेनेजुएला की सेना के जरिये एक बड़े ड्रग्स कार्टेल का संचालन कर रहे हैं। इसके तहत कैरेबियन सागर में 15,000 सैनिक और फाइटर जेट तैनात किए गए और वेनेजुएला के जहाजों पर हमले किए गए। जब मादुरो की सत्ता पर पकड़ कमजोर हुई, तो अमेरिका ने 3 जनवरी को हमला किया, लेकिन इस पर किसी प्रकार का विरोध नहीं देखने को मिला। बड़ा सवाल यह उठता है कि जब अमेरिकी सैनिक मादुरो के निवास में दाखिल हुए और उन्हें हिरासत में लिया, तो वेनेजुएला की सुरक्षा बल क्या कर रही थी। इसका संकेत है कि मादुरो की व्यवस्था को अंदर से कमजोर कर दिया गया था।
चीन और रूस सहित कई देशों ने ट्रंप की इस कार्रवाई की आलोचना की है। यहां तक कि अमेरिका की पूर्व उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने भी इस ऑपरेशन को गैर-कानूनी करार दिया। इसमें कोई संदेह नहीं कि मादुरो एक क्रूर और अनैतिक शासक था, लेकिन इस तरह के सैन्य हस्तक्षेप, चाहे वह तख्तापलट हो या तेल के रणनीतिक लाभ के लिए लड़ी जाने वाली लड़ाई, अक्सर शक्ति प्रदर्शन तक ही सीमित रह जाती हैं। ये कार्रवाइयां अंततः वैश्विक अस्थिरता का कारण बन सकती हैं, जिसका खामियाजा अमेरिकी नागरिकों और दुनिया भर के अन्य देशों को भी भुगतना पड़ता है।
कमला हैरिस ने सीधे तौर पर इस कार्रवाई के पीछे तेल से जुड़ी आर्थिक मंशा की ओर इशारा किया है। अब तक अमेरिका जिन देशों के खिलाफ कदम उठा चुका है, उनका असर भारत पर भी पड़ा है। उदाहरण के तौर पर, ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों ने भारत को तेल आयात में कटौती करने पर मजबूर किया था। 2000 से 2010 के बीच ONGC वेनेजुएला से बड़े स्तर पर कच्चा तेल आयात करता था, लेकिन 2019 में लगाए गए अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से भारत को यह आयात काफी हद तक कम करना पड़ा। 2024-25 के दौरान भारत महज 364 मिलियन डॉलर मूल्य का तेल आयात कर सका, जो काफी कम था।
जहां तक वेनेजुएला के खिलाफ कार्रवाई का सवाल है, इसका भारत पर तत्काल आर्थिक असर ज्यादा नहीं दिखता। हालांकि, यह स्पष्ट है कि हर बार जब अमेरिका इस तरह का कदम उठाता है, तो उसके पीछे अपनी ताकत और फायदे का घमंड झलकता है। यह स्थिति न केवल अंतरराष्ट्रीय स्थिरता के लिए खतरा है बल्कि एक शांति-प्रिय विश्व के लिए भी गंभीर चुनौती बनती है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें