अमेरिका का रवैया, भारत के लिए आपदा में अवसर
- पूर्व राजदूत ने बताई रणनीति,
नई दिल्ली, ६ अक्तूबर - अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप द्वारा एक के बाद एक फैसलों से भारत की मेधा और व्यापार प्रभावित होने की आशंका प्रबल है, लेकिन हमारे लिए यह आपदा में अवसर की तरह है। विश्व के सबसे पुराने और सबसे बड़े लोकतंत्र के बीच रिश्तों में आई तल्खी को गहराई से समझते हुए हमें रणनीति बनाकर आगे बढ़ना होगा।
यह कहना है कि भारतीय विदेश सेवा के पूर्व अधिकारी और रूस में तैनात रह चुके अनिल त्रिगुणायत का। पूर्व राजदूत त्रिगुणायत ने सोमवार को भारत-अमेरिका रिश्ता विषय पर आयोजित राष्ट्रीय जागरण विमर्श में कहा कि मेक इन इंडिया पर विशेष जोर होना चाहिए। भारत को आत्मनिर्भर बनना ही होगा।
'अमेरिका सिर्फ लाभ चाहता है'
हालांकि यह कहना जितना आसान है, करना उतना ही चुनौतीपूर्ण है, लेकिन हमें यह करना ही होगा।ट्रंप द्वारा भारत पर लगाए गए अतिरिक्त टैरिफ और भारत के अन्य देशों के साथ व्यापारिक रिश्तों के संबंध में ऑनलाइन विमर्श में पूर्व राजदूत ने कहा कि एक बात हमें मान लेनी चाहिए कि अमेरिका हमेशा सिर्फ यह सोचता है कि उसका लाभ कहां है? वह सिर्फ अपने हित की दिशा में ही सोचता है।
उसका रुख यही रहता है कि आप (भारत) रूस या कहीं और से क्यों खरीद कर रहे हैं? सभी देशों के अलग-अलग राष्ट्रों से कूटनीतिक-व्यापारिक संबंध होते हैं और ऐसे समय में जब भारत जैसा बड़ा देश 2047 तक विकसित होने का सपना देख रहा है तो इस तरह का दबाव कैसे बर्दाश्त कर सकता है? उन्होंने कहा कि अमेरिका से अभी जिस तरह की स्थितियां हैं, वे एक अवसर की तरह भी हैं कि आप उन्हें व्यापार में बदलें।'
अमेरिका में स्कूल ड्रॉप आउट काफी ज्यादा
भारत को व्यापार के लिए अभी ढाई दशक तक शांतिपूर्ण माहौल चाहिए। इस लिहाज से दीर्घकालिक रणनीति बनाकर काम करना होगा। जरूरत इस बात की है कि हम भारत में ही उत्पाद तैयार करें। कई बार ऐसा होता है कि जब हमें जरूरत होती है तो संबंधित देशों से उस उत्पाद की उपलब्धता नहीं होती। तकनीक भी नहीं मिल पाती।2050 में सक्षम मैनपावर वाला देश होगा भारत पूर्व राजदूत ने कहा कि अमेरिका में स्कूल स्तर पर 40-50 प्रतिशत ड्रॉप आउट दर है। कॉलेज स्तर पर भी 82 प्रतिशत छात्र प्रथम वर्ष में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं।
जाहिर है कि अमेरिका के पास तकनीकी दक्षता का अभाव है और आगे भी रहेगा। भारत ही एक ऐसा देश है जो दुनिया में 2050 तक तकनीकी रूप से सक्षम मैनपावर तैयार करेगा। आज हमें जरूर समस्या है, लेकिन यह स्थिर ही रहेगी, ऐसा नहीं है। जर्मनी और जापान भारत के इंजीनियरों को लेने को तैयार हैं। चीन ने तो भारतीय पेशेवरों के लिए नया वीजा शुरू कर दिया है। जरूरी नहीं है कि एक रास्ता बंद हो गया तो अवसर खत्म हो गए।
भारत-अमेरिका रिश्ता जटिल दौर
सिर्फ सकारात्मक विश्वास के साथ आगे बढ़ने की जरूरत होती है और भारत की विदेश नीति इसी दिशा में आगे बढ़ रही है। त्रिगुणायत ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप भारत से इसलिए सबसे ज्यादा खफा दिखते हैं क्योंकि पिछले दिनों पाकिस्तान के खिलाफ भारत ने ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया। इसे रोकने का श्रेय लेने की बात ट्रंप बार-बार करते रहे, लेकिन भारत ने इसका खंडन किया। वह चाहते थे कि भारत उनकी वाहवाही करे।
उन्होंने कहा कि भारत-अमेरिका रिश्ता जटिल दौर से गुजर रहा है, लेकिन यह स्थिति स्थायी नहीं है। वैश्विक राजनीति में कूटनीतिक तौर पर कुछ भी स्थायी नहीं होता। भारत-अमेरिका रिश्ता बीती सदी के नौवें दशक से ही थ्री डी के रूप में देखा जाता रहा है, लेकिन अब उसमें एक और डी जुड़ गया है- डेमोक्रेसी, डिफेंस एंड सिक्योरिटी, डायस्पोरा यानी प्रवासी भारतीय समुदाय और डिसरप्शन। चौथा डी ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में बना है। ट्रंप हमेशा धमकी भरे अंदाज में रहते हैं जो भारत के लिए समस्या है।
on - Monday, October 6, 2025,
Filed under - अमेरिका , आंतरराष्ट्रीय
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